Eshan's Special Interview Series: Bhagwant Anmol

Eshan's Special Interview Series: Mr.Bhagwant Anmol candid with Eshan Sharma, One of the youngest biographical writer in India
Bhagwant Anmol, Guest of the day


(Common Question of Writer's Destination) आप हमें अपने बारे में, अपने बचपन एवं अपने स्टूडेंट लाइफ के बारे में कुछ बताये?

मेरा बचपन पानी में कागज़ की नावं, गुल्ली डंडा और क्रिकेट खेलते हुए एवं डीडी वन में शक्तिमान तथा सकलाका बूम बूम देखते हुए बीता. हाफ पेंट वाले विद्यालय- सरस्वती विद्या मंदिर में पढता था, जहाँ क्लास में पढने वाली लड़कियों को पहले दिन ही बहन बना दिया जाता था. तो स्टूडेंट लाइफ में लड़कियों से दोस्ती वोस्ती कुछ हो नहीं पायी. दिनचर्या कुछ इस प्रकार थी- सुबह साइकिल उठाता और चल पड़ता कोचिंग पढने, वापस आता, स्कूल ड्रेस पहनकर फिर निकल पड़ता स्कूल, स्कूल से वापस आने के बाद गणित की कोचिंग. कुछ ऐसे ही सारा दिन बीत जाता था. पढता कम साइकिल ज्यादा चलाता था.
थोडा बड़ा हुआ आईआईटी का चस्का लगा, कानपुर आगया. काकादेव में कमरा लिया और वही आशीष, अनीश, पंकज की क्लास की भीड़ में आखिरी बेंच पर बैठने लगा. आईआईटी में तो सिलेक्शन नहीं हुआ पर सामने लड़की रहती थी, प्यार जरुर हो गया.



1-    आप बहुत बिजी होंगे, फिर भी अपने व्यस्त जीवन से किस तरह लिखने और पढने के लिए टाइम निकालते है ?

बिजी बड़ा रिलेटिव टर्म है. अपनी जरुरत के लिए कोई बिजी नहीं रहता. साहित्य मेरा खाद्य पानी है. इसके बिना मैं नहीं रह सकता. हाँ, यह जरुर है कि मैं पुस्तके कम पढ़ पाता हूँ. परन्तु कोशिश रहती है कि एक महीने में एक किताब तो जरुर पढ़ लू, अगर ऐसा करने में सफल हो जाता हूँ तो साल में एक दर्जन किताबे तो डकार ही लेता हूँ.
जहाँ तक बात रही लिखने की तो मैं कोशिश करता हूँ कि कम से कम लिखूं . राइटिंग में ज्यादा और ख़राब का जोड़ा है, ज्यादा लिखोगे तो बाते रिपीट जरुर होती है.

2-    आप अपना राइटिंग का काम कब करते है? क्या कोई विशेष जगह है, जहाँ बैठ कर लिखते है?

अगर मैं गलत नहीं हूँ तो धीरू भाई अम्बानी ने कहा है ‘ सोच किसी के बाप की जागीर नहीं है, वह कभी भी और कहीं भी आ सकती है.’ मै क्या शायद अधिकतर लेखको पर यह बात फॉलो होती है. जहाँ तक रही मेरी बात तो मुझे जब भी विचार आता है, मैं कोशिश करता हूँ न लिखूं. जब विचार बहुत हावी हो जाता है, जब ऐसा लगता है- उस विचार को लिखे बिना ज़िन्दगी में कुछ छूट जाएगा. जब ऐसा लगता है,  बिना लिखे, मन भारी हो जाएगा, तब ही लिखता हूँ. जहाँ तक रही लिखने के लिए कोई भी निश्चित जगह की बात तो हमें अभी चन्द्रगुप्त मौर्य की तरह कोई सिंघासन नहीं मिला है, जहाँ बैठकर अच्छे विचार आये . हम तो मन मौजी है, जहाँ पे भी बैठने की जगह मिल गयी और लिखने का मन हुआ, लिखने लग जाता हूँ.

3-    आपको पहली किताब लिखने के लिए प्रेरणा कहाँ से मिली?

शुरुआती लेखक के दो ही साथी है, एक कलम और दूसरी मोहब्बत की यादे. कलम साथ था और साथ मिल गया मोहब्बत की यादो का, बस बन गयी किताब !!!
खैर, बचपन में कविताएं लिखता था, शायद कक्षा तीन में एक तुकबंदी लिखी थी. मैं क्रिकेट भी अच्छा खेलता था. पर घर वाले आईआईटी फोबिया से पीड़ित थे. सब उसी खेल के मैदान में छूट गया. बड़ा हुआ मोहब्बत हुई. तब स्मार्ट फ़ोन और लैपटॉप हर किसी के पास नहीं होते थे. मैं अपने पास डायरी रखा करता था. और प्रेम कहानी डायरी में लिखा करता था. मैं हाफ पेंट वाले स्कूल से था, और मेरी गर्लफ्रेंड शार्ट स्कर्ट वाले इंग्लिश मीडियम स्कूल - वीरेंद्र स्वरुप से. वो चेतन भगत की किताबे पढ़ती थी और मै बस स्टॉप पे जाकर मनोहर कहानियां खरीदने वालो में से था. मैं अंग्रेजी में डायरी लिखता, वह उसमे सुधार करती थी. इंग्लिश मीडियम गर्लफ्रेंड होने के ये फायदे तो होते है. वह चेतन भगत को पढ़ती, उसके बारे में बताती, तो मैं इस बात से कतई इनकार नहीं करूँगा कि मेरे लिखने के  पीछे चेतन भगत के स्टारडम का हाथ नहीं है .. दूसरी तरफ बचपन की वह प्रतिभा एक बार फिर से उभरकर सामने आगई. भले ही उस गर्लफ्रेंड के माध्यम से हो .

4-    आजकल आप क्या लिख रहे है? जरा अपने आगामी प्रोजेक्ट के बारे में बताये.

इस जुलाई मेरी किताब ‘ज़िन्दगी 50-50’ राजपाल एंड संज प्रकाशन से प्रकाशित होने वाली है. जो सामाजिक सरोकारों के साथ हर वर्ग के लिए है, भले ही वह वृद्ध हो या फिर युवा, या फिर बच्चा. सभी के लिए बहुत कुछ है किताब में.

 मेरी एक और किताब इस वर्ष प्रकाशित होने वाली है, वह है मोटिवेशनल किताब ‘ तुम्हे जीतना ही होगा’ असल में इस किताब को मैंने उत्तर भारत के सबसे चर्चित मोटिवेशनल स्पीकर में से एक अरुणेन्द्र सोनी जी के साथ लिखा है.  जो इंद्रा पब्लिशिंग हाउस, भोपाल से 23 अगस्त को प्रकाशित हो रही है. इसे हम कम से कम 25 शहरो में लांच करने के बारे में सोच रहे है.

5-    आपके पसंदीदा लेखक कौन है? उनके लेखन की किस बात से आप बहुत प्रभावित हुए?

यह कह पाना बहुत मुश्किल है, अधिकतर लेखको को, जिन्हें मैंने पढ़ा है, उनका कुछ न कुछ मुझे अच्छा लगा है और उनसे सीखने को मिला है. मैंने मोटीवेसनल एवं प्रेरक किताबे अधिक पढ़ी  है. शिव खेडा, रोबिन शर्मा से लेकर रोंडा बर्न, नार्मन विंसेट पील, नेपोलियन हिल तक सबको पढ़ा है. जहाँ तक रही साहित्य की बात तो इंग्लिश में उन्ही कुछ ख्याति प्राप्त लेखको को पढ़ा है. जबकि हिंदी साहित्य में विमल चन्द्र पाण्डेय, शकील समर, प्रभात रंजन, मनीषा कुलश्रेष्ठ, राजीव रंजन प्रसाद, सत्य व्यास, असगर वजाहत, संदीप नय्यर, सुधीर मौर्या जैसे समकालीन लेखको को पढ़ा हुआ है.

6-    किताब लिखने का विचार कहाँ से आता है?
       एक लेखक की खासियत यही है कि वह अपनी बातो या फिर अपनी किताबो को दोहराए नहीं. अगर एक जैसी दो किताबे हो गयी तो दूसरी लिखने का  क्या फ़ायदा, कागज़ बर्बाद और लोगो का समय भी. पर्यावरण की रक्षा करना हमारा कर्त्तव्य है. मैं खुद को इस बात पर भरसक उतारने की कोशिश करता हूँ. इसीलिए मेरी पहली किताब ‘द परफेक्ट लव’ थी, जो प्रेम कहानी थी. दूसरी किताब ‘एक रिश्ता बेनाम सा’ है जो हकलाने की समस्या पर है. तीसरी किताब ‘कामयाबी के अनमोल रहस्य’ मोटिवेशनल किताब  है, जो बेस्ट सेलर रही है. जिसका कई भाषाओ में अनुवाद भी हो चूका है. चौथी किताब ‘ज़िन्दगी 50-50’ ज़िन्दगी के विभिन्न पहलुओ पर आधारित है.
तो मैं समाज के विभिन्न पहलुओ पर ध्यान देता हूँ, वहीँ से कहानी चुनने की कोशिश करता हूँ. अधिक से अधिक उन विषयो पर लिखना चाहता हूँ, जिन पर अब तक सबसे कम लिखा गया हो!! किताब का टॉपिक सोचने में मुझे वर्षो लग जाते है, जैसा मैंने ऊपर भी बताया है कि जब तक मन पूरी तरह से उन विचारों से भर नहीं जाता और वे बाहर बहने को बेताब नहीं हो जाते, तब तक मैं नहीं लिखता.

7-    क्या आप कोई और किताब लिख रहे है? आप किस तरह से कहानी बुनते है?

नहीं, अभी फिलहाल तो अधिक कुछ नहीं लिखना. अभी सिर्फ पढना है, और अपनी आने वाली किताब ‘ज़िन्दगी 50-50’ और ‘तुम्हे जीतना ही होगा’ का प्रचार प्रसार करना है.
अभी मैंने हाल ही में अपनी नौकरी छोड़ी है, इसलिए अपने इंस्टिट्यूट को पटरी पर भी लाना है. कहते है भूखे भजन न होए गोपाला, तो पहले अपने पेट के लिए भी सोचना है.

8-    पहली किताब आने के बाद आपके अन्दर कैसे अनुभव मिले? क्या बदलाव आये ?

मैं भी आपकी तरह कैंपस ऑथर रहा हूँ. कैंपस ऑथर के साथ दिक्कत यह होती है कि लेखक उस वक्त वह उपलब्धि पा लेता है जब उसके साथी सेमेस्टर एक्साम्स पास करने की तैयारी में लगे रहते है. जिस वजह से उसके दोस्तों के बीच उसका काफी भौकाल जमने लगता है. मेरे साथ भी ऐसा ही हुआ, पूरे कॉलेज का में फेमस हो गया. कानपूर में चर्चाये शुरू हो गयी, कानपूर के बुक स्टोर वाले पहचानने लगे. इधर उधर से लड़कियों के फोन आने लगे और मैं हवा में उड़ान भरने लगा. लोगो के मेसेजो का जवाब न देना, हवा में उड़ना, बिजी होने का दिखावा करना. परन्तु धीरे धीरे मैं आगे बढ़ता गया और लोगो से सीखता गया. अब जाकर यह बात समझ आई कि व्यक्ति का जीवन पेड़ की तरह होता है, जितना लचीला बनके रहोगे, उतनी देर तक टिक पाओगे.


9-    राइटिंग से समाज बदला जा सकता है . आप अपने लेखन की मदद से किस तरह समाज को बदलना चाहते है?
मैं इस बात में पूरी तरह विश्वास रखता हूँ कि किताबो से दुनिया बदलती है. अगर आज आप आईआईटी में है तो वह किताबो की वजह से है और मैं आज जो कुछ भी हूँ, वह प्रेरक किताबो की वजह से हूँ. साहित्य ने भी मुझे बदला है .
किताबे सिर्फ मनोरंजन का साधन नहीं है, मनोरंजन किताब का अंग हो सकता है पर संपूर्ण किताब नहीं. किताब से कुछ न कुछ समाज को नई दिशा देने के लिए निष्कर्ष निकलना चाहिए. मेरे साथ भी  शुरुआत चेतन भगत को देखकर हुई थी पर धीरे धीरे, चेतन भगत का बुखार उतरने लगा और अच्छे साहित्य की ओर मुड़ने लगा. आज मैं साहित्य से खुद को बदल चूका हूँ और चाहता हूँ पाठक भी बदल सके.
जहाँ तक रही मेरी बात तो मैं अच्छी खासी सॉफ्टवेर की नौकरी कर रहा था, विदेश जाने का भी मौका था पर सब कुछ छोड़कर कानपुर में हकलाने वाले लोगो के लिए ‘इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ़ स्पीच थेरेपी’ स्टार्ट कर दी. यह सब साहित्य की वजह ही थी, कि मुझे पता लगा कि इंसानियत पहले नंबर पर है, धन उसके बाद. साहित्य से दुनिया बदलती है, साथ ही साथ मेरा यह भी मानना है - दुनिया बदलने की शुरुआत उस चेहरे से करनी चाहिए, जो आईने के सामने नजर आता है.
रही बात लिखने की तो मैंने पहले भी कहा है कि मैं समाज के उन विषयो पर लिखने की कोशिश करता हूँ जिनके बारे में  अधिक न लिखा गया हो. एक रिश्ता बेनाम सा, हकलाने की समस्या पर है, मैं हकलाने की समस्या का पीड़ित रहा हूँ, मैंने उसमे  सुधार किया है, इसलिए मैंने उस विषय को कलमबद्ध किया. जहाँ रही बात ‘ज़िन्दगी 50-50’ की तो वह ज़िन्दगी के विब्भिन्न पहलुओ पर किताब है, जिसमे किन्नर और शरीर की कुछ कमियों के बारे में विधिवत उठाया गया है.
    जबकि ‘कामयाबी के अनमोल रहस्य’ और ‘तुम्हे जीतना ही होगा’ प्रेरणा दायक पुस्तक है.                         जो युवाओं को जीवन में आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करेगी.

10-           क्या आप अन्य लेखको को कुछ सलाह देना चाहेंगे?

अभी मैंने ऐसा कुछ भी अचीव नहीं किया जो मैं लेखको सलाह दे सकू. अभी सिर्फ सीखने के दौर से गुजर रहा हूँ. बस सोच रहा हूँ अनवरत कुछ न कुछ सीखता रहूँ.

11-           अंत में आप अपने पाठको से कुछ कहना चाहते है?

मेरे पाठक ही मेरा प्यार है, मेरा परिवार है. भले ही यह परिवार छोटा हो पर सब मेरे है. उनसे बस यही कहना है कि मेरा बस एक ही मकसद है कि आपकी उम्मीदों पर खरा उतर सकू. और मैं इस बात से उन्हें आश्ववस्त करता हूँ कि आपको कभी निराश नहीं होने दूंगा.



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