Eshan's Special Interview Series: Chaman Mishra on his book 'Tanya'

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ESHAN'S SPECIAL INTERVIEW SERIES: CHAMAN MISHRA ON HIS BOOK 'TANYA'



आज हम आपके लिए लाए हैं, इन दिनों सोशल मीडिया पर चर्चित किताब तान्या के युवा लेखक चमन मिश्रा का एक प्यारा-सा साक्षात्कार। चमन मिश्रा की किताब तान्या लॉन्च हो चुकी है। तो हमने उनसे बात की।

 
सवाल- तान्या में कहानी क्या है ?

जवाब- इसके लिए आप तुरंत अमेजॉन से किताब ख़रीद लीजिए। (हंसते हुए). दरअसल, तान्या हर उस लड़की की कहानी है, जो हक़ के साथ अपनी बात रखती है। हर मुद्दे पर बोलना जानती है। सोशल मीडिया पर रहती है, लेकिन छोटी-छोटी बातों को लेकर संवेदनशील भी होती है। तान्या आज के युग की कहानी है। आज की अल्ट्रा मॉडर्न लड़की के साहस और उसके त्याग की कहानी है।

सवाल- क्या ये आपकी जिंदगी से जुड़ी हुई कहानी है ? कहते हैं कि लेखक जो करता है, महसूसता है उसी को लिख देता है। हिंदी साहित्य में यथार्थवाद ने क़ाफ़ी चर्चाएं बटोरीं हैं, क्या आपकी भी यथार्थ पर बेस्ड कहानी है ?

जवाब-  नहीं, ये पूरी तरह से फ़िक्शन है। इसमें मेरी जिंदगी का कुछ भी नहीं है। हां, ये कह सकते हैं, कि जिन जगहों पर मैं रहा, उन जगहों के नाम वैसे के वैसे ही उठा कर रख दिए गए हैं। दो-एक पात्रों के नाम भी मेरे दोस्तों के नाम पर रखे गए हैं। कह सकते हैं कि कुछ यथार्थ है और बाकी कल्पना। जिसे जादुई यथार्थ कहा जाता है।

सवाल- मुख्यत किस वर्ग को टारगेट करके ये किताब लिखी गई है ?

जवाब- ये किताब पूरी तरह से यूथ के लिए है। उन्हीं की बोलचाल की भाषा का इसमें प्रयोग किया गया है, लेकिन हां, पत्रकार हूं तो कुछ चीजें तो आनीं हीं थी, सो आपको किताब में दिख जाएगा।

सवाल- आपने अपने परिचय में बताया कि ये नई वाली हिंदी में लिखी गई किताब है। ये नई वाली हिंदी क्या है ?

जवाब- नई वाली हिंदी साफ़ और सीधे तौर पर बोलचाल कि भाषा यानि कि सरल शब्दों में, बातचीत की शैली में अपनी बात लिख देने वाली हिंदी है। पहले होता क्या था कि हिंदी के लेखक इतनी कठिन हिंदी लिखते थे कि हिंदी भाषी लोगों को पढ़ने में भी दिक्कत आती थी। पढ़ भी लेते थे तो समझ नहीं पाते थे। इसलिए हिंदी की ये हालत हो गई। मतलब साफ है- अगर वरिष्ठों को लगता है कि उनकी वाली हिंदी सही है तो उसे ढ़ोंए लेकिन हम यूथ के लिए हमारी हिंदी कूल है।

सवाल- आप इसे कूल कहते हैं। कुछ वरिष्ठ लेखक इसकी आलोचना करते हुए इसे लुगदी साहित्य बताते हैं।

जवाब- किसने बताया ? मेरी जानकारी में नहीं है। लेकिन हां, मैं इतना कह सकता हूं कि अगर आज दिव्य प्रकाश दुबे की या फिर सत्य व्यास की किताबें मेट्रो में, फ्लाइट में पढ़ीं जा रहीं हैं, तो क्या ये हिंदी की तरक्की नहीं है। इस देश के एक बड़े वर्ग तक हिंदी को पहुंचाना क्या गलत है। हम जैसे थे, वैसे ही क्यों रहना चाहते हैं ? पता नहीं किसने कहा है- जो भाषा खुद में बदलाव नहीं कर सकती वो खत्म हो जाती है।

सवाल- बहस ज्यादा सीरियस हो गई। ये बताइए रिस्पॉस कैसा जा रहा है ?

जवाब- अभी संपादक की तरफ़ से कुछ पता नहीं चला। हां, ये कह सकता हूं सोशल मीडिया पर लोगों ने पसंद की है। अमेजॉन पर रेटिंग्स भी अच्छी हैं।

सवाल- लप्रेक के बारे में आपका क्या ख्याल है ?

जवाब- लप्रेक एक अच्छा कॉन्सेप्ट था. ऐसी चीजें हिंदी में आती रहनीं चाहिए। ये जरूरी है।

सवाल- आप पत्रकार भी हैं, इससे लिखने में आसानी हुई ?

जवाब- बिल्कुल, यह तो है। दरअसल, जिस तरह की किताब मैं लिख रहा था, उसमें ख़बरों का पता होना बहुत जरूरी है. इसलिए मुझे मेरे काम ने मदद तो दी।

सवाल- मैं सोशल मीडिया पर आपकी टाइमलाइन देख रहा था। मधु को आप भी पसंद करते हैं।

जवाब- मधु से बहुत बिमारियां सही होतीं हैं, उसे सभी को रोज़ पीना चाहिए। हां, अगर आप बच्चन जी के मधु की बात कर रहे हैं, तो मैं कहूंगा कि नहीं। वो तो लेखन में जान डालने के लिए लिखा जाता है. जरूरी नहीं कि जो हम लिखें वही करें। मैंने आपसे पहले भी कहा मैं फ़िक्शन लिखता हूं। जोकि पूरी तरह से फ़िक्शन होते हैं।

सवाल- चेतन भगत को लेकर कुछ कहेंगे ?

जवाब- हम छोटे लोग हैं, हमसे किताब को लेकर ही पूछ लीजिए।

सवाल- कहते हैं कि हिंदी की किताब पब्लिश कराना बहुत कठिन है। वो भी पहली किताब। आपने हिंद युग्म से कैसे पब्लिश करा ली?

जवाब- मैंने सैंपल भेजा था। हिंद युग्म के संपादक शैलेश भारतवासी जी को। उन्हें अच्छा लगा। उन्होंने हां, कर दी। इसके बाद हम लोगों ने पूरी साल संपादक-लेखक वाली मेलबाज़ी की, उसका आउटकम आपके सामने है। वैसे भी हिंद युग्म नए लेखकों को मौके देने के लिए जाना जाता है।

सवाल- अगली क़िताब कौन-सी होगी ?

जवाब- अभी तक कुछ प्लान नहीं है। देखते हैं जो भी शुरू हो जाएगा वो लिख जाएगा। पॉलिटिकल लिखना जरूरी ही, जिसमें हमारे वक्त दिखे। जैसा माहौल बना दिया गया है वो दिखे। अब वो फ़िक्शन में होगा या फिर नॉन फ़िक्शन में ये तो वक्त ही तय करेगा।

सवाल- क़िताब को लेकर किसी एक पाठक की टिप्पणी जो आपको अब तक अच्छी लगी हो?

जवाब- आशुतोष तिवारी ने क़िताब को लेकर जो लिखा वो मैं आपको बताना चाहूंगा-
तीन बार ऑस्कर जीत चुकी अभिनेत्री मेरिल स्ट्रीप गोल्डन ग्लोब समारोह में अपना विख्यात भाषण दे रही थीं। उनकी जुबान में ट्रम्प के व्यवहार की तीखी आलोचना थी। कला की दुनिया की दिग्गज सख्सियतों की निगाहें शालीन रवैये से अपनी बात रखती इस भद्र महिला पर जमी थीं जिसके शब्द अगले दिन अखबार में सुर्खियाँ बनने वाले थे। उन्होंने अपनी बात एक तीखी भावनात्मक चुप्पी के साथ ख़तम की। मंच से जाने से पहले उन्होंने अपनी गुजर चुकी दोस्त प्रिंसेस लिया’ की एक पंक्ति को याद करते हुए अपने वक्तव्य की आखिरी बात कही- अपने टूटे हुए दिल को कला में बदल दो!
अपने जख्मी हुए दिल को कला में बदल दो !
चमन मिश्र की किताब तान्या’ मैंने पढ़ ली है। लगभग सौ पन्नों की इस किताब को पढने के बाद मुझे मेरिल स्ट्रीप की यह आखिरी बात याद आ गई। मुझे नहीं पता कि लेखक ने इस किताब को लिखते हुए इस पंक्ति को कितना जिया है, पर ऐसी किताबें इस तरह की प्रेरणा से ही लिखी जाती हैं।  ‘प्यार बहुत सहजता से हो जाता है।  दुःख का कोई अंत नहीं होता है। ख़ुदकुशी कला की दुनिया में सबसे खूबसूरत मौत है।’ यह तीन सच किताब पढने के बाद स्वाभाविक रूप से पाठक के दिमाग में दर्ज हो जाते हैं।
इसका मतलब यह नहीं है कि किताब बहुत गंभीर विषय पर है’ या फिर वेदना या दुःख जैसे दार्शनिक मुद्दों पर लिखी गयी है। दर्शन तो समय-समय पर इस की कहानी से यूं ही टकरा जाता है। ‘तान्या’ एक नायिका प्रधान प्रस्तुति है। एक अनाथ लडकी की कहानी है जिसे रवि नाम के लडके से बेहद प्यार हो जाता है। तान्या स्वयं भी निर्भीकसुलझी हुई और कई जगह तो किताब के नायक रवि से ज्यादा समझदार है। किताब का अंत कलात्मक है। कला की यही नियति होती है। रचना का सबसे मजबूत पक्ष इसका कथानक है।

सवाल- अंतिम सवाल, हिंदी के पाठकों से कुछ कहना चाहेंगे।


जवाब- बेशक, मैं कहना चाहूंगा कि आप क्या पढ़ना चाहते हो ये आप तय करिए। फालतू की बौध्दिकता के चक्कर में जो जानते हैं वो भी ख़राब मत कीजिए। और हां, सबसे पहले अपनी भाषा को अच्छे से समझिए, पढ़िए और शुद्ध लिखिए, जब आपकी मातृ भाषा पर पकड़ होगी, तभी दूसरी भाषाएं सीख पाएंगे। और अंत में तान्या जरूर पढ़िए।

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