राष्ट्रपती भवन की यात्रा

राष्ट्रपति भवन की यात्रा : एक अनोखा अनुभव


किसी भी भारतीय के लिए यह एक गौरव की बात होगी कि उसको देश  के महामहिम राष्ट्रपति के भवन से आमंत्रण आये । देश के सर्वे सर्वा राष्ट्रपति, जिनका पद सबसे उच्च है, वो अगर किसी को आमंत्रित करें तो इससे बड़ी बात शायद ही कोई हो।

८ मार्च को मुझे एक मेल प्राप्त हुआ जो कि राष्ट्रपति भवन से था। मुझे लगा कि हालाकि राष्ट्रपति जी के साथ मेरे अपॉइंटमेंट की अर्जी को खारिज करने के लिए  एक औपचारिक पत्र होगा। परन्तु मेल खोलते ही तीन अटैचमेंट पर नजर गई, फिर देखा कि राष्ट्र स्तंब सत्यमेव जयते के छाप वाले पत्र पर मेरा नाम लिखा है। उसको खोलते ही मेरे पैर जमीन से शायाद नाता नहीं रखे। मै शायद हवा में था क्यूंकि वो एक औपचारिक निमंत्रण पत्र था। मौका था ब्लू क्राफ्ट फाउंडेशन के द्वारा लिखित किताब 'fulfilling Bapu's dreams- Prime Minister's tribute to Gandhiji' के विमोचन का।

८ की शाम का वक्त रहा होगा कि मां और पापा शहर की ओर गए थे कि तभी मैंने उन्हें कई मिस कॉल करी। घर आते ही मैंने दोनों को यह वाक्या सुनाया और वो पत्र दिखाया। तभी कार्यक्रम की दिनांक पर नज़र डाली जो थी ९ मार्च २०१८, मतलब अगले दिन शाम को ५ बजे। कानपुर से दिल्ली टिकट भी नहीं, अगले दिन जाना नामुमकिन था। खैर किसी तरह टिकट मिली और मैं अकेला ९ तारीक के दोपहर के समय १ बजे दिल्ली बुआ के घर पहुंचा। पीतमपुरा से राष्ट्रपति भवन की दूरी करीब ४५ मिनट की है।

भवन में पहुंचने का समय ४:३० था। मैं मेरे बड़े भैया पार्थ शर्मा के साथ सूट बूट में मेट्रो से निकला। कोहाट एन्क्लेव से केंद्रीय सचिवालय के लिए निकला। घर से निकलने में थोड़ी देर हो गई थी तो थोड़ा डर लगा कि कहीं लेट ना हो जाए। पर सब समय पर हुआ हम राष्ट्रपति भवन ४:३५-४:४० मिनट पर पहुंच गए।

हम राष्ट्रपति भवन के फोरकोर्ट में थे जहां बड़े बड़े लोगों को राष्ट्रपति स्वागत करते है। हमें पूरे रास्ते सभी आर्मी के लोगों ने आदर के साथ फोरकोर्ट में मुख्य सीढ़ियो के सामने जहां केवल अति विशिष्ट व्यक्तियों को ही जाने मिलता है वहां हमारी कार रुकी मुझे उतारा और गाड़ी चली गई। वहां मुझे अपना पत्र दिखाना था। फिर जब मैने उन सीढ़ियों पर पैर रखा तो एकदम से शरीर में झनझनाहट सी हुई। वो पल गर्व से भरा था जब मैं देश के राजा के महल में एक ऑफिशियल गेस्ट के रुप में आया। राष्ट्रपति भवन के गुंबद पर हमारा तिरंगा शान से लेहरा रहा था जो राष्ट्रपति के भवन में मौजूद होने का प्रतीक है। एक राष्ट्रीयता की भावना जगी, एक ऊर्जा महसूस हुई। जब मैं  सीढ़ी चढ़ रहा था तब मन में विचार था कि यार यही से राष्ट्रपति भी चढ़ते उतरते है, वहीं सीढ़ी वहीं रेड कारपेट वहीं सिपाही वहीं द्वारपाल। इन सीढ़ियों के बाद आया दरबार हॉल का भव्य दरवाज़ा जहां हमारा स्वागत करने के लिए कई अहम लोग थे। 

दरबार हॉल की भव्यता को शब्दों के पिंजरे में कैद करना उतना ही मुश्किल है जितना भगवान की असीम अनुकम्पा की जिसके कारण मैं वहां तक पहुंचा। पहले आधे घंटे में हॉल को देखता रहा, मोबाइल माना था तो अपने स्मृतियों में कैद करने की कोशिश कर रहा था। उसकी भव्यता को, उसके सौंदर्य को। मुख्य गुंबद के  ठीक नीचे एक बड़ी सी आलीशान झूमर लगी थी। दरवाजे से घुसते ही राष्ट्रपति महोदय का आसन जो की छत को छू रहा था। आसन पर सत्यमेव जयते की अशोक लाट। वहां ५ वीं सदी की बेहद खूबसूरत भगवान बुद्ध की प्रतिमा। कितना मनोरम दृश्य था। हर तरफ हमारी संस्कृति और इतिहास की झलक दिखती हैं। एक तरफ आज़ाद भारत के पहले गवर्नर जनरल सी. राजगोपालचारी की पेंटिंग, दूसरी तरफ बापू की तस्वीर, तीसरी ओर देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरु जी की पेंटिंग और चौथी तरह देश के पहले महामहिम राष्ट्रपति डाक्टर राजेन्द्र प्रसाद जी की पेंटिंग थी। हर तरह राष्ट्रपति अंगरक्षक की तैनाती। एक तरफ आर्मी बैंड, दूसरी तरफ भजन गायन के लिए एक मंडली। एक तरफ राष्ट्रपति के आगमन और प्रस्थान के लिए ट्रम्पेट पर मंगल ध्वनि बजाने के लिए सैनिक।

सौभाग्य की बात है मैने परम पूज्य श्री सदगुरू जग्गी वासुदेव जी के साथ प्रवेश किया। प्रवेश करते ही मुझे एबीपी न्यूज़ के प्रसिद्ध पत्रकार दिबांग मिले। नमस्कार किया और मैं अपनी सीट पर जा बैठा। घबराहट से मुंह सूख गया था तो पानी की तलाश में मैं तीसरी लाइन में बैठ गया। अचानक से ट्रंपेट पर मंगल ध्वनि बजी जिसका अर्थ होता है कि राष्ट्रपति महोदय पधार रहे हैं, हम सब अपने स्थानों पर खड़े हो गए। उनके पहुंचते ही बैंड पार्टी ने राष्ट्रगान बजाया।

राष्ट्रपति भवन में राष्ट्रपति महोदय के साथ दरबार हॉल में राष्ट्रगान गाने का अवसर काफी कम लोगों को नसीब होता है। काफी गर्व हो रहा था। और एक देशप्रेम कि भावना भी उत्पन्न हुई। पहली बार राष्ट्रपति को सजीव देख रहा था। आपको हसी आएगी की तब मैं ये सोच रहा था कि यह तो वैसे ही दिखते है जैसे टीवी पर। पर मित्रो उस वक़्त आपको नहीं सूझता की हम क्या बच्चो जैसी बात सोच रहे है। उस वक़्त आप एक अलग ही आनंद में विचार करते है।

कार्यक्रम शुरू हुआ। पहले बापू के प्रिय भजन ' वैष्णव जनतो तेने रेे '   की प्रस्तुति की गई। उसके बाद सुलभ इंटरनेशनल के संस्थापक पद्म भूषण श्री ब्रिंधेश्वर पाठक जी ने कुछ शब्द बोले। उसके बाद परम पूज्य श्री सदगुरू जग्गी वासुदेव जी ने अपना आशीर्वाद दिया। फिर राष्ट्रपति अभिभाषण की बारी आयी। कार्यक्रम के बाद हमें हाई टी के लिए आमंत्रित किया गया। मैं दरबार हॉल से कॉरिडोर की तरफ निकला की वहां हमारे सभी राष्ट्रपतियों के चित्रों को देखने का मौका मिला।

वहीं देश के आखरी वायसरॉय लॉर्ड माउंटबेटन और लेडी माउंटबेटन की तस्वीरों को देखने मिला। फिर हम बैंक्वेट हॉल पहुंचे। जहां नाश्ते और चाय का इंतजाम था। काफी लोगों ने मुझसे पूछा फेसबुक पर पूछा कि खाने में क्या था। दोस्तों, खाने में समोसा, पनीर की एक डिश, बालुशाई और शानदार ब्राउनी। काफी स्वादिष्ठ व्यंजन थे। बर्तनों में भी सत्यमेव जयते बना था। जो चीख चीख कर कह रहे थे कि अगर दो समोसे खाओगे और फिर झूट बोलोगे कि सिर्फ़ एक खाया फिर सत्य ही जीतेगा। खैर कम पत्ती की चाय के साथ में श्री बृंधेश्वर पाठक जी के पास पहुंचा। मेरे नाना स्वर्गीय श्री सच्चिदानंद पांडेय उनके योग शिक्षक थे। उनसे कुछ पल वार्ता की फिर में परम पूज्य श्री सदगुरू जग्गी वासुदेव जी का आशीर्वाद लेने पहुंचा। उनसे भी कुछ वार्ता करने का सौभाग्य मिला। साथ ही वहां मीनाक्षी लेखी जी से भी मिलने का मौका मिला। वहीं मेरी नजर मधुर भंडारकर पर पड़ी। बैंक्वेट हॉल के ठीक पीछे मनोरम सुंदर मुगल गार्डन का दृश्य देखने का भी सौभाग्य प्राप्त हुआ।

सबसे बढ़कर मुझे वहां मेरे शिक्षक मिले। डाक्टर ए पी जे अब्दुल कलाम जी के पवित्र पेंटिंग का दर्शन हुआ। बेहद खुशी थी और गर्व भी की कलाम साहब के वजह से आज में वहां तक पहुंचा। मै कुछ पल के लिए एक अलग दुनिया में पहुंच गया। मै एक प्रकार से ध्यान की अवस्था में पहुंच गया। वो सुंदर पेंटिंग जिसमे कि कलाम साहब एक हाथ में पृथ्वी मिसाइल पकड़े हुए हैं और उनके पीछे तिरंगा। राष्ट्रपति भवन कितना मनोरम सुंदर है कितना भव्य है उसको बयां करना शायद मेरी कलम इजाज़त नहीं देती। निकलते समय भी कलाम साहब के एक प्रतिमा ने मन मोह लिया। मैंने वहां भी कुछ पल आत्म वार्ता करी। ऐसा लग रहा था कि मैं कलाम साहब से ही मिल रहा था। निकलते समय फिर एक बार दरबार हॉल को देखा और इतने सारे स्मृतियों के साथ में ईशान शर्मा कानपुर से दिल्ली तक का सफर तय करके आया था और इतनी अच्छी यादों को समेटकर फोरकोर्ट से होते हुए वापस घर पहुंचा।

मेरी इन्हीं गौरवपूर्ण यादों को अमर बनाने के लिए मैं यह कलमबद्ध कर रहा हूं। मुझे इस यात्रा के बाद और कई किताबें लिखने की प्रेरणा मिली।

ईशान शर्मा
१२-१३ मार्च २०१८
मध्यरात्रि



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