दिल्ली - एक शहर से कुछ ज़्यादा

दिल्ली - एक शहर से कुछ ज़्यादा 


ईशान शर्मा 
दिल्ली की हवा आजकल ज़हर से कम नहीं है| दिल्ली एक ऐसा शहर है जो केवल एक शहर नहीं बल्कि एक पूरा अलग विश्व है| हर तरफ गाड़ियाँ दौड़ लगा रहीं है और आगे बढ़ने  की होड़ में है| दिल्ली जो कभी दिल वालों का शहर था आजकल वो बीमार फेफड़ों को शहर बनता जा रहा है, जैसा की अभिषेक बच्चन की दिल्ली ६ फिल्म में कहा था कि यह शहर नहीं महफ़िल है| आजकल की वाईफाई की ज़िन्दगी में वो डायरी के पन्नों पर लिखी दास्तां कितनी प्रासंगिक है, सोचने पर मजबूर करती है कि इस सुंदर स्मृति को शब्दों में कैसे पिरोया जाए। 🌺 समय और लोग बड़ी जल्दी बदलते है पर कुछ यादें और कुछ लोग ज़िन्दगी भर साथ रहते है। दिल्ली भी वैसा ही है| 

मैं मूलतः दिल्ली वासी नहीं हूँ, मैं कानपूर उत्तर प्रदेश का रहने वाला हूँ पर हर रोज़ हज़ारों दिल्ली पलायन करने वालों में मैं भी एक था जो दिल्ली विश्वविद्यालय में दाखिला लेने दिल्ली आया और अब इसको अपना दूसरा घर बना बैठा| दिल्ली आये हुए अभी मुझे कुछ ही महीने हुए है पर स्वास लेने में दिक्कत महसूस होने लगी है| 

• फिजाएं खूब रहेंगी गुलशन में दम तक,
मगर अफसोस हम न होंगे महसूस करने को। 
घटाएं खूब बरसेंगी मौसम भी बनेगा
मगर अफसोस हम न होंगे इनमें डूब जाने को। •


दिल्ली या कहें इंद्रप्रस्थ जैसे शहर अब देश में कई है जिनको मेट्रो सिटी कहा जाता है जिसमे कलकत्ता, मद्रास और बॉम्बे जैसे शहरों के नाम शुमार हैं| यहाँ ज़िन्दगी घडी के काटें से भी आगे भागने का प्रयास करती है और रिंग रोड से ज़्यादा घुमाती है, हर पल हर व्यक्ति इस दौड़ का हिस्सा बनता है| प्रातः जब में महाविद्यालय जाता हूँ मेट्रो से तब जो नज़ारा देखता हूँ हर तरफ टेंशन, किसी की जॉब नहीं लग रही, कोई बीमार है, किसी का टेंडर पास नहीं हो रहा, किसी का वव्यापार सही नहीं चल रहा और फिर मैं सोचता हूँ की क्या दिल्ली ने इन सबकी ज़िन्दगी खा ली? 

मंडी हाउस पर उड़ते हुए पंछी की आकृति 
दिल्ली में हर रंग है, हर गली में कोई राजा तो कोई रंक है| आप साउथ दिल्ली अगर जाये मेरे कहने से तो आप देखेंगे अंग्रेजी भाषा भाषी भारतीयों को या कहूं 'इंग्लिश स्पीकिंग इंडियंस', अच्छा है एक ही शहर में हर प्रकार का व्यक्तित्व देखने मिलता है | दिल्ली कभी उन ख्वाबों को उड़ान देता था जो आशाओं से परिपूर्ण थे, नेशनल स्कूल ऑफ़ ड्रामा, दिल्ली विश्वविद्यालय,जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय पर आज अगर आप मंडी हाउस जाएँ जो की दिल्ली की जान है और मेट्रो स्टेशन से बाहर नज़र घुमाएंगे तो आपको एक उड़ने की कोशिश करता बाज़ की आकृति देखेंगे जिसको देखकर कभी कभी सोचना पड़ता है कि क्या इस वाईफाई भरी ज़िन्दगी में और दूषित आबो हवा में कोई ख़्वाब उड़ने का सपना देखता है? देखते है आज भी कोई गांव देहात के हमारे भाई बंधू दिल्ली आने का सपना देखते होंगे, लालटेन के नीचे पढ़ते होंगे और उड़ने के ख़्वाब बुनते होंगे और मैं आशा करता हूँ सबके सपने पूरे हों, अच्छे दिन जल्द आएं| 

दिल्ली तुझसे बस एक ही बात कहनी है कि आज फिर जीने की तम्मना है, हम सब की प्रदुषण सही करने का इरादा है| दिल्ली एक शहर से कुछ ज़्यादा है| 

न जाने कब से पराए भी अपने से लगने लगे,
न जाने कब से अपने भी पराए से लगने लगे,
न जाने कब से अंजाना शहर भी अपना सा लगने लगा।


ईशान शर्मा 
१४-१५ नवम्बर २०१८ 
मध्यरात्रिः 
नई दिल्ली 

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