आज का भारत - देश से कुछ ज़्यादा

आज का भारत - देश से कुछ ज़्यादा


ईशान शर्मा 
आज का भारत या कहूं इंडिया, एक देश से कुछ ज़्यादा है| यहाँ के लोग काफी भावुक प्रवत्ति के है और जो देश नदियों को भी माँ कहते हो हम उस देश के वासी है और मैं इस देश के युवा जनसँख्या का भाग हूँ| भारत में आज के ज़माने में युवा होना एक सौभाग्य है और काफी ज़िम्मेदारी भरा काम है क्योंकि आपको और हमको मिलकर देश को विकसित करना होगा| 

हम सभी विश्व के सर्वाधिक युवा जनसंख्या वाले देश का हिस्सा है। हम सभी आने वाले समय के लीडर है और हम पर ही आश्रित है इस देश का भविष्य। आज हम जो करेंगे उसका परिणाम आने वाले वक्त में हमें मिलेगा। हम सभी युवाओं को 2030 का जो सपना संयुक्त राष्ट्र ने देखा है सस्टेनेबल डेवलपमेंट का उसको अपने देश पर लागू करके अपने देश को भी विकसित करना है। उसके लिए हमे सबसे पहले अपने को जानना चाहिए। आप किसी और कि तरह न बनकर अपनी तरह बनिए और जो आपकी खूबी है उसको इस्तेमाल कर देश हित में कार्य करिए। मेरा अपने युवा साथियों के लिए सिर्फ एक ही संदेश है कि आप जो करें मन लगाकर करें, आप अपनी खोज करिए और हम सब कलाम साहब जैसे बन सकते है पर तब जब हम कलाम साहब की तरह नहीं पर अपनी तरह बनने का प्रयास करेंगे।

युवा शक्ति की ताकत समझना एक देश के लिए बहुत गंभीर बात है क्योकि सिर्फ समझना सब कुछ नहीं बल्कि देश हित में उस शक्ति का प्रयोग करना आवश्यक है अगर हम आज बात करते है चीन या अमेरिका की तो हम देखेंगे कि यह देश सभी साधनों को अच्छे से इस्तेमाल करते हैं| मैं दिल्ली में रहता हूँ जो कि देश की राजनीती का केंद्र है और यह शहर ऐसा है जो कभी नहीं सोता और दुःख इसका है की सारा देश ऐसा बनता जा रहा है| 

विकास हमारी नींद भी ले रहा है और समय है यह सोचने का और समझने का कि इस भागम  भाग की ज़िन्दगी से दो पल कैसे चुराए और अपने को पहचाने| आज कुछ लोगों के लिए बड़ा मुश्किल होगा यह बताना की वो आखिरी बार कब अपने परिवार के साथ बैठ या अकेले बैठ अपने बारे में सोचा होगा| 
तू क्या कर रहा रे इंसान 
तू खुद ही गड्ढा खोजता है 
पल पल सरकार को कोसता है 
तू क्या कर रहा रे इंसान 

खोजे हुए गड्ढे में खुद गिरता 
गली गली मारा मारा तू फिरता 
बिन लक्ष्य आवारा फिर घूमता 
बेसुध तू मस्ती में अपनी 
सिर्फ अपना ही तू सोचता है 
तू क्या कर रहा रे इंसान 

गिन गिनकर बाल पकते 
मेरे फ़साने के अंबार लगते 
तू फिर भी दिन रात 
इस अंधी दौड़ में भागता है 
तू खुद खुदा है फिर भी खुदा को खोजता है 

इस आपाधापी में दिन रोज़ 
जवानी गवाता, बुढ़ापा कमाता 
सनसनाती घंटी फ़ोन की 
फिर रोज़ खींचातानी सहता है 
इंसान, तू रैन सवेर कितनी ज़िल्लत झेलता है 
फिर तू खुद ही गड्ढा ढूंढता है 
पल पल सरकार को कोसता है | 



ईशान शर्मा 

15 नवम्बर 2018 

Comments