मेट्रो का सफर - सफ़र से कुछ ज़्यादा

 मेट्रो का सफ़र - सफ़र से कुछ ज़्यादा



ईशान शर्मा 
वैसे तो सफ़र हम सब रोज़ करते ही है चाहे वो हिंदी का हो या अंग्रेजी का, पर क्या फ़र्क पड़ता है, हम इंसान ज़िन्दगी में जो काम रोज़ करते है उसकी एहमियत हमारे लिए सिर्फ नहाने, धोने और खाने जितनी रह जाती है पर सफ़र जो शब्द है वो अपने में ही हर बार एक नया फ़साना और एक नया एहसास होता है लेकिन इस भागती दौड़ती मेट्रो शहर की ज़िन्दगी में जब हमारी साँस की रफ़्तार से तेज़ हमारे फ़ोन में मैसेज आते है तब हमारा ध्यान मेट्रो के सफर पर कैसे होगा? प्रश्न तो अच्छा है पर क्या हमारे पास इसका जवाब है? जी नहीं| 

आपको अगर मेरी बातों पर विश्वास हो तो मैं आपको बताता हूँ कि अगर आप अपने सफ़र पर ध्यान देंगे तो ज़िन्दगी की कितनी सारी बातें जानेंगे, मुझे तो मेरा हर सफ़र कुछ अलग लगता है क्यूंकि हर बार और हर मेट्रो में नए लोग, नए फ़साने और नए नज़ारे देखने और जीने मिलते है| हमारी ज़िन्दगी इतनी भी उलझी नहीं है जितनी हमने बना रखी है और दिल्ली और मेट्रो के सफर में जो भीड़ होती है वही आपकी उलझी ज़िन्दगी को सुलझाने के लिए बहुत है| 

सफ़र, सिर्फ  एक जगह से दूसरे जगह जाने तक का समय ही नहीं है बल्कि सफर ज़िन्दगी भर के लिए फ़साने बुनने की कला को भी कहा जा सकता है क्यूंकि जब मैं सफ़र पर होता हूँ तब कई ऐसी चीज़े होती हैं जो जीवन भर आपको याद रहतीं है जैसे एक बार मेट्रो में मेरा पैर फ़िसल गया था, चाहे वो पल दर्द देने वाला रहा हो पर उसके बाद अभी भी यह बात याद करता हूँ तो हसी आती है| 

एक बार मैं किसी ओर मेट्रो से सफर कर रहा था तो मेरी नज़र एक आदमी पर जो स्वचालित सीढ़ियों (escalator ) पर था उसके हाँथ में एक काला ब्रीफ़केस था, दिखने में लग रहा था की उसका मन उदास है, ज़िन्दगी से हारा हुआ, थका हुआ, ऑफिस से दिलशाद गार्डन की ओर जाने वाली मेट्रो की तरफ़ जाता हुआ वो आदमी प्लेटफार्म पर पहुँचते ही खिलखिलाने लगा और एक बूढ़ी दादी से गले लगा और कुछ बातें करते करते मेट्रो में चढ़ गया और फिर मैं अपनी मंज़िल की ओर बढ़ गया, ख़ैर बात कुछ ख़ास नहीं थी पर फिर भी मेरे दिमाग में वो याद रह गयी और मुझे छोटी ही सही, ज़िन्दगी में एक  बात सीखा गई कि जब आप कमाते है और आप घर की ज़िम्मेदारी निभाते है तो अपने दुःख और दर्द आप अपनों से नहीं जताते और खुद सह जाते है जैसे कि शायद उस आदमी ने किया था| 
ये ज़माना कुछ को ख़ैरात में मुसाफिर देता है,
कुछ ढूँढ़ते-ढूँढ़ते ही राह पूरी कर लेते है| 

अब ऐसे ही कई फ़साने होते है और हर फ़साना मेट्रो के सफर को एक आम ट्रैन के सफर से कुछ ज़्यादा एहमियत देता है क्यूंकि मेट्रो का सफ़र ज़िन्दगी भर जितना लम्बा तो नहीं होता पर वो आपको कई बार ज़िन्दगी भर की सीख देता है| 

इक चंद अल्फ़ाज़ मुंतज़िर है बोलने को,
मगर दिल - ए - नादान इजाज़त नहीं देता| 

ख़ैर आज के लिए इतना है| 
आपका,

ईशान शर्मा 
eshansha@gmail.com

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